मंत्र शक्ति के चमत्कार

बुधवार, 4 मई 2011

ISHOPANISHAD-1

ईशा वास्यमिद œं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम्।। 1।।

- इस गतिशील जगत् में जो कुछ भी है वह ईश से आच्छादित है, अत: त्याग-भावना से भोग करो। यह समस्त धन किसका है- उस परमात्मा का ही तो है।
भावार्थ : मनुष्य मात्र को चाहिये कि सर्वत्र व्यापक परमात्मा को जानकर अन्यान्य से किसी के धनादि पदार्थ की इच्छा भी न करे। जो धर्मात्मा  पुरूष परमेश्वर को सर्वत्र व्यापक, सर्वान्तर्यामी जानकर कभी पाप नहीं करते और सदा प्रभु के ध्यान और स्मरण में अपने समय को लगाते हैं, वे महापुरूष इस लोक में सुखी और परलोक में मुक्ति-सुख को प्राप्त करके सदा आनन्द में रहते हैं। 

ईशोपनिषद्: (यजुर्वेद का चालीसवाँ अध्याय)

ईशा वास्यमिद œं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम्।। 1।।
कुर्वन्नवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत् œं समा:।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।। 2।।
असुय्र्या नाम ते लोका ऽ अन्धेन तमसावृता:।
ताँस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनो जना:।। 3।।
अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा ऽ आप्रुवन् पूर्वमर्षत्।
तद्धावतो ऽ न्यानत्येति तिष्ठतस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति।। 4।।
तदेजति तन्नेजति तद्दूरे तद्वन्ति के।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यत:।। 5।।
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति।
सर्व भूतेषु चात्मानं ततो न विचिकित्सति।। 6।।
यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत:।
तत्र को मोह: क: शोक:ऽ एकत्वमनुपश्यत:।। 7।।
स पय्र्यगाच्छु क्रमकायव्रणमस्नाविर œं शुद्धमपाप विद्धम्।
कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:।। 8।।
अन्धतम: प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते।
ततो भूय ऽ इव ते तमो य ऽ उ सम्भूत्या œं रता:।। 9।।
अन्यदेवाहु: सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।। 10।।
सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वे दोभय œं सह।
विनाशेन मृत्युं तीत्र्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते।। 11।।
अन्धंतम: प्र विशन्ति येऽअविद्यामुपासते।
ततो भूय ऽइव ते तमो य ऽउ विद्वाया œं रता।। 12।।
अन्यदेवाहुर्विद्यायाया ऽ अन्यदाहुरविद्यायाया:।
इति शुश्रुमधीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।। 13।।
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभ्य œं सह।
अविद्यया मृत्युं तीत्र्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते।। 14।।
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तँ शरीरम्।
ओऊम् क्रतो स्मर क्लिबे स्मर कृत œं स्मर।। 15।।
अग्रे नय सुपथा राये ऽ अस्मान्विश्वानिदेव वयुनानि विद्वान्।
युयोधस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम ऽ उक्तिं विधेम।। 16।।
हिरण्मयेनपात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
योऽसावादित्ये पुरूष: सोऽसावहम्। ओऊम् खं ब्रह्म।। 17।।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

प्रबन्धन एवं योग्यता

प्रबन्धन एवं योग्यता

अमंत्रं अक्षरं नास्ति , नास्ति मूलं अनौषधं ।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति, योजकः तत्र दुर्लभ: ॥
— शुक्राचार्य
कोई अक्षर ऐसा नही है जिससे (कोई) मन्त्र न शुरु होता हो , कोई ऐसा मूल (जड़) नही है , जिससे कोई औषधि न बनती हो और कोई भी आदमी अयोग्य नही होता , उसको काम मे लेने वाले (मैनेजर) ही दुर्लभ हैं ।

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कोऽतिभारः समर्थानामं , किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सविद्यानां , कः परः प्रियवादिनाम् ॥
— पंचतंत्र
जो समर्थ हैं उनके लिये अति भार क्या है ? व्यवस्सयियों के लिये दूर क्या है?
विद्वानों के लिये विदेश क्या है? प्रिय बोलने वालों के लिये कौन पराया है ?

गुरुवार, 31 मार्च 2011

Gayatri Mantra

OUM BHURBHUVAH SVA. TATSAVITURVARENYAM BHARGO DEVASYA DHEE MAHI. DHIYO YO NAH PRACHODAYAT.

universol prayer

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दु:ख भाग्भवेत् ।।