ॐ प्रणव का सबसे पहले उच्चारण इसलिये किया जाता है कि ॐ प्रणव सबसे पहले प्रकट हुआ है। ॐ ब्रह्म का वाचक भी है। इसमें तीन ध्वनियाँ.अए उ और म शामिल हैं। अ उष्मा या विकास की अग्नी हैए उ उठना तथा म संकोच अथवा लीन हो जाना है।अ और म के मिश्रण से ही पूरी सृष्टी बनी है। इस प्रणव की तीन मात्राएँ हैं। इन मात्राओं से त्रिपदा गायत्री प्रकट हुई हैं और त्रिपदा गायत्री से ऋक्सामयजुः..वेद त्रयी प्रकट हुई हैं।
श्री-सूक्त
हिरण्यवर्णां हरिणिं सुवर्णरजतस्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१।।
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्।।२।।
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदनीम्।
श्रियं देवीमुप हृये श्रीर्मा देवी जुषताम्।।३।।
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारा माद्रां
ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां
तामिहोप हृये श्रियम्।।४।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं
श्रीयं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये
ऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वा वृणे।।५।।
आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो
वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुन्दतु
या अन्तरा याश्र्च बाह्या अलक्ष्मीः।।६।।
उपैतु मां देवसखः
कीर्तिश्च मणीना सह।
प्रादर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्
कीर्तिमृद्धिं ददातु मे।।७।।
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमशमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्।।८।।
गन्धद्वारां दुराधुर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप हृये श्रियम्।।९।।
मनसः काममाकूर्तिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूमन्नस्य मयि श्रीःश्रयतां यशः।।१०।।
कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कूले मातरं पद्ममालिनीम्।।११।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले।।१२।।
आर्द्रां पुषपकारणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१३।।
आर्द्रां यः करणीं यघ्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१४।।
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो
दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्।।१५।।
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्।।१६।।
५... महा मृत्युञ्जय मन्त्र
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।
(ऋग्वेद ७।५९।१२)(शुक्ल यजुर्वेद ३।६०)
अर्थात.
हम त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर की पूजा करते हैंए मंत्यधर्म से (मरणशील मानवधर्म मृत्यु से) रहित दिव्य सुगन्धि से युक्तए उपासकों के लिये धन.धान्य आदि पुष्टि को बढ़ाने वाले हैं। वे त्रिनेत्रधारी उर्वारुक (कर्कटी या ककड़ी.जो पकने पर स्वतः पौध से अलग हो जाती है) फल की तरह हम सबको अपमृत्यु या सांसारिक मृत्यु से मुक्त करें। स्वर्गरूप या मुक्तिरूप अमृत से हमको न छुड़ायें अर्थात् अमृत-तत्व से हम उपासकों को वंचित न करे ।
६...वेदोक्त रात्रिसू्क्त (ऋग्वेद १०।१२७। १से८ )
रात्री व्यक्यदायती पुरुत्रा देव्य१ क्षभिः। विश्र्वा अधि श्रियोऽधित।।१।।
अनेक भागों में विस्तृत होने वाली अगमन करती हुई नक्षत्ररूप नेत्रो से जगत् का अवलोकन करने करने वाली रात्रिदेवी सभी प्रकार केसौन्दर्य को धारण करती हैं।
ओर्वप्रा अमर्त्या निवतो देव्यु१ द्वूतः। ज्योतिषा बाधते तमः।।२।।
अविनाशी रात्रि देवी सर्वप्रथम अन्तरिक्ष को तत्पश्र्चात् नीचे और ऊँचे प्रदेशो को आच्छादित करती हैं। वे ग्रह.नक्षत्रादि रूप से तेजस्विता से अन्धकार को निवृत करती हैं।
निरु स्वसारमस्कृतोषसं देव्यायती। अपेदु हासते तमः।।३।।
आगमन करने वाली रात्रिदेवी भगनी उषा को प्रतिष्ठित करती हैं। वे ;उषाद्ध अन्धकार को विनष्ट करती हैं।
सा नो अद्य यस्या वयं नि ते यामन्नविक्ष्महि। वृक्षे न वसतिं वयः।।४।।
जैसे पक्षी वृक्षों पर रहते हैंए वैसे ही जिसके आगमन पर हम घर में विश्राम करते हैंएवे रात्रिदेवी हमारे लिये कल्याणप्रद हों।
नि ग्रामासो अविक्षत नि पद्वून्तो नि पक्षिणः। नि श्येनासाश्र्चिदर्थिनः।।५।।
रात्रि में समस्त ग्रामीण मनुष्य सुखपूर्वक सोते हैंए पादचारी अश्वादि पशु.पक्षी और शीघ्रगामी शयेन आदि पक्षी शान्त होकर सोते हैं।
यावया वृक्यं१वृकं यवय स्तेनमूर्म्ये।अथा नः सुतरा भव।।६।।
हे निशादेवि ! वृक और वृकी को हमसे पृथक् करेएचोरों को भी हमसे दूर ले जाएँ। हमारे लिये आप सभी प्रकार से कल्याणप्रद हों।
उप मा पेपिशत्तमः कृष्णं व्यक्तमस्थित ।उष ऋणेव यातय।।७।।
रात्रि का अन्धकार स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। हे उषा देवी! जिस प्रकार आप स्तोताओं के ऋण को धन प्रदान करके विनष्ट करती हैंए वैसे ही इस अन्धकार को भी नष्ट करें।
उप ते गा इवाकरं वृणीष्व दुहितर्दिवः। रात्रि स्तोमं न जिग्युषे।।८।।
हे आकाश कन्या ;रात्रिद्ध! हम आपको दुधारू गौ के समान स्तोत्रों का गान करते हुए प्राप्त करें। आप विनम्र होकर स्तोत्रों के समान ही हवि को भी ग्रहण करें।
ऋग्वेदीय संदेश
ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविराविर्य एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि।सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु। तद् वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
अर्थात.
मेरी वाणी मन में और मन वाणी में प्रतिष्ठित हो। हे ईश्वर! आप मेरे समक्ष प्रकट हों। मन और वाणी! मझे वेदविषयक ज्ञान दो। मेरा ज्ञान क्षीण नहीं हो। मैं अनवरत अध्ययन में लगा रहूँ। मैं श्रेष्ठ शब्द बोलूँगा, सदा सत्य बोलूँगा, ईश्वर मेरी रक्षा करे। वक्ता की रक्षा करे। मेरे अध्यात्मिकए आधिदैविक और आधिभौतिक त्रिविध ताप शान्त हों।
शान्ति प्रार्थनाः.
(1) पृथिवी शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिर्द्यौः शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिर्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे मे देवाः शान्तिः सर्वे मे देवाः शान्तिः शान्तिः शान्तिः शान्तिभिः ।
(अथर्ववेद १९।९।१४)
अर्थात् पृथिवी हमें शान्ति देय आनतरिक्षएद्यौए जल औषधएवनस्पतिए विश्वदेव सब देवता शान्ति देय इन सब शान्तियों के अतिरिक्त मझे शान्ति प्राप्त हो। इनके द्वारा विपरीत अनुष्ठान से भयंकर प्राप्त होने वाले फल को हम दूर करते हैं। सब मङ्गलमय होएशान्तिहोएकल्याण हो।
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