ईशा वास्यमिद œं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम्।। 1।।
तेन त्येक्तेन भुञ्जीथा मा गृध: कस्य स्विद्धनम्।। 1।।
- इस गतिशील जगत् में जो कुछ भी है वह ईश से आच्छादित है, अत: त्याग-भावना से भोग करो। यह समस्त धन किसका है- उस परमात्मा का ही तो है।भावार्थ : मनुष्य मात्र को चाहिये कि सर्वत्र व्यापक परमात्मा को जानकर अन्यान्य से किसी के धनादि पदार्थ की इच्छा भी न करे। जो धर्मात्मा पुरूष परमेश्वर को सर्वत्र व्यापक, सर्वान्तर्यामी जानकर कभी पाप नहीं करते और सदा प्रभु के ध्यान और स्मरण में अपने समय को लगाते हैं, वे महापुरूष इस लोक में सुखी और परलोक में मुक्ति-सुख को प्राप्त करके सदा आनन्द में रहते हैं।