मंत्र शक्ति के चमत्कार

बुधवार, 22 मई 2013

वैदिक उपासना


वैदिक उपासना

वैदिक निर्णय के अनुसार वैदिक उपासना प्रति दिन करनी चाहिए। द्विजमात्र को इस उपासना का अधिकार है। इस अनुष्ठान से अनजाने में भी किए गए पाप का लोप होता है। उपर्युक्त किसी तरह का पाप यदि दिन में विहित हो तो सायंकाल की संध्या से दूर होता है। प्रत्येक वेद की संध्या का विधान विभिन्न गृह्यसूत्रों द्वारा प्रतिपादित है। इस अनुष्ठान के द्वारा दिव्यज्योतिए सूर्य या ब्रह्म की उपासना की जाती है।

इसका प्रारंभ करने से पूर्व उषाकाल में निद्रा का विसर्जन कर उठ बैठना चाहिए। सर्वप्रथम अपने इष्टदेव का स्मरण ओर वंदन करना चाहिए। अनंतर दैनिक दैहिक कृत्य से निवृत्त होकर संविधि स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करे। पवित्र आसन पर बैठकर तिलक लगावे और शिखाबंधन करे। सायंकाल की संध्या पश्चिम दिशा की ओर और प्रातरूकालए मध्यान्हकाल की संध्या पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। जिस दिन यज्ञोपवीत होता है उसी दिन से इसका अनुष्ठान प्रारंभ होता है। यह उपासना प्रति दिन और यावज्जीवन अनुष्ठेय है।

भगवान् के अनेक नाम उसके अनेक गुणों के आधार पर ही हैं द्य उपासक अपनी उपासना में जब भगवान के किसी नाम का उच्चारण करता हैए तो उसका तत्पर्य होता है उस नाम से ध्वनित होने वाले उस गुण से अपनी आत्मा को अलंकृत करना द्य इस मन्त्र में भगवान को संबोधन करता हुआ उपासक भगवान के नाम का उच्चारण करता हैए और वह नाम है श्शतक्रतुश् द्य ऋषि दयानन्द नें श्शतश् शब्द के श्बहुतश् और श्क्रतुश् शब्द के श्कर्मश् और श्ज्ञान अर्थ किए हैं द्य

इस शब्द का उच्चारण करते ही उपासक एक विशाल क्षेत्र में पहुँच जाता है और यह कहना आरम्भ कर देता है द्य अहो ! मैं यह क्या विचित्र दृष्य देख रहा हूं द्य यह महान प्रकाश का पुञ्ज आदित्य अनेक ग्रहों और नक्षत्रों कोए अपने आकर्षण के रस्से से बांधे हुए कितने वेग से गोल चक्र में चला रहा है द्य और इनमें से भी कोई किसी की औरए कोई किसी के चारों ओर घूम रहा है य और इन सबका यह भ्रमण भी समान गति से नहीं विषम गति से सम्पादित होता दिखाई दे रहा है द्य

प्रभो ! आप अद्भुत हैं और अद्भुत शक्तियों के भण्डार हैं द्य आप के बिना इस अद्भुत कर्म चक्र का संचालक कोन हो सकता है द्य इन गति शील अनेक गोलों का अद्भुत निर्माण भी तो आपके ही अद्भुत कौशल का चमत्कार है द्य इसलिये तो आपके लिये कहा गया है ष्तदेजति तनैजतिष् वह सब को चला रहा है द्य परन्तु स्वयं अचल है द्य

करोड़ों.करोड़ों हिन्दू धर्मावलम्बियों की आस्था को अनुप्राणित रखने वाले ये मन्त्र उनके जीवन में विशिष्ट स्थान रखते है। ये उनके दैनिक प्रार्थना एवं उपासना के अनिवार्य भाग हैं। प्रायः ये मन्त्र भारतीय परम्परा में बाल्यकाल से ही संस्कार के रूप में कण्ठस्थ करा दिये जाते हैं। परन्तु सभी को मन्त्र का अर्थ ज्ञात नहीं रहता और इसका सीधा कारण है संस्कृत ज्ञान का न होना। इसी उद्देश्य को लेकर यहाँ हिन्दू उपासना में दैनन्दिनी प्रार्थना एवं उपासना में प्रयुक्त मन्त्रों को अर्थ सहित उपलब्ध कराया गया है। क्योंकि क्रिया के साथ ज्ञान आवश्यक हैं। यदि सम्यकतया जानकर किसी कार्य को किया जाता है तो उसका फल अलग होता है और बिना जाने किये गये कार्य का फल अलग होता है।

मन्त्र से सरल अभिप्राय मनन करने से है। एवं मनन उन बातों का किया जाता है जो श्रेष्ठए कल्याण कारक होती हैं। वैदिक परम्परा में ऋषियों ने दीर्घ तप तथा साधना के मार्ग से जीवन के जिन आधारभूत सत्यों का साक्षात्कार किया वे ही मन्त्र का रूप हैं। उनका ही अनुगमन करके ही आर्य श्रेष्ठ कहलाए। ऋषियों द्वारा खोजे गये वैश्विक धरोहर के रूप में ये मन्त्र ज्ञान एवं विज्ञान से परिपूर्ण हैं । ये आज न केवल देश में वरन् विदेशों में अनेक शोधों का विषय बने हुये हैं।

वैदिक संध्या के अंतर्गत अघमर्षण मन्त्रों का चिंतन करते हुए मन व आत्मा को निष्पाप बनाएँ ....

यथा-
ओ३म ऋतंच सत्यन्चाभीद्धातप्सोअध्यजायत !
तत्तो रात्र्यजायत ततरू समुद्रोअरणवरू !!
समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत !
अहोरात्रानि विदधद्विश्व्स्य मिषतो वशी !!
सूर्याचन्द्र्मसौ धाता यथापूर्वंम्कल्पयत !
दीवंच पृथ्वीन्चान्त्रिक्षमथो स्वरू !!

उपरोक्त मन्त्र का भावार्थ .....

प्रभु सामर्थ्य सनातन रहता ! सृष्टि प्रलय क्रम जिससे बहता !!
प्रभु की शक्ति तपस के द्वारा ! पहले ऋत का हुआ पसारा !!
ऋकए यजुए साम वेद अथर्वा ! श्रुति के सत्य नियम ऋत सर्वा !!
ऋत के साथ सत्य चल पडता ! सत रज तम हो प्रकृति विविधता !!
महाप्रलय की रात्रि विराजे ! अंतरिक्ष.भू सागर साजे !!
महाजलधि से थल आ जाता ! सकल पदार्थ ईश बनाता !!
अंतरिक्ष पृथ्वी की सत्ता ! प्रकट हुई फिर काल महत्ता !!
क्षण मुहूर्त दिन प्रहार बनाए ! मॉस.वर्ष.संवत्सर आये !!
विश्ववशी का करतब जागा ! दिवस रात्रि का हुआ विभागा !!
सूर्य. चंद्र नक्षत्र उगाए ! पूर्व कल्प की भांति सजाये !!
द्दो.अंतरिक्ष.भूलोक बनाता ! सृष्टि पूर्ण यों रचता धाता !!
पाप.पुण्य प्रभु सबके लखता ! यथा योग्य फल निर्णय करता !!
सोच ईश विस्तार यहए लाख उसका निर्माण !
मनुज तनिक सी लब्धि परए क्यों करता अभिमान !
विफल हुआ तो क्या हुआए कर प्रभु से संवाद !
शातिमान प्रभु शरण सेए मिट जाएँ अवसाद !!



क्या हें संध्या ;वैदिकद्धण्ण्घ्घ्घ्

दिन और रात्रि केए रात्रि और दिन के तथा पूर्वान्ह और अपरान्ह के संधिकाल में एकाग्रचित्त होकर जो उपासना की जाती हैए उसे संध्या कहते हैं। अथवा उपर्युक्त संधिकाल में विहित उपासना में किए जानेवाले कार्यकलाप को भी संध्या कहते हैं। इस प्रकार सायंकालए प्रातरूकाल और मध्यान्हकाल में यह उपासना की जाती है। इन्हीं नामों से तीन संध्याएँ प्रचलित हैं। सूर्यास्त के समय से नक्षत्रोदय पर्वत सायंकाल की संध्या काए अरुणोदय से सूर्योदय पर्यंत प्रातरूकाल की संध्या का और पूर्वान्ह और अपरान्ह के संधिकाल में मध्याह्लकाल को संध्या का समय प्रशस्त है।

ब्रह्मा शब्द का अर्थ ही है वृद्धए बढ़ा.चढ़ाए पहुंचा हुआ। जो स्वयं ष्पहुंचा हुआश् हैवही अन्य को लक्ष्य तक पहुंचा सकता है। ऐसा व्यक्ति मार्ग प्रदर्शक गुरु होने योग्य होता है। उसके हाथों में बागडोर सोंपी जा सकती है। उसे समर्पण किया जा सकता है। उस पर भरोसा किया जा सकता है। उसके आदेश बिना ष्किन्तु.परन्तुश् के माने जा सकते हैं। उसका वचन व्यर्थ नहीं जा सकता। वाणी ऐसे ब्रह्मा की दासी होती है।

जीवन यज्ञ की वेदि है। यज्ञ देव की पूजाए देव की संगतिए देव का करण और देव के लिए दान को कहते हैं। यज्ञ द्वारा देव का अपने व्यक्तित्व में आविर्भाव किया जाता है। और तब यजमान मनुष्य से ऊपर देव हो जाता है। मनुष्य कहते हैं ऋतहीनता कोए देव कहते हैं सत्यात्मता की। यथार्थ तथ्य यह है कि मनुष्य को अन्ततः देव बनना है। देव की जीवनचर्या ऋत कहाती है। देव के विपरीत है असुर। असुर की जीवनचर्या अन्‌.ऋत है। अनृतात्मा मनुष्य असुर होता है। उससे देव मैत्री नहीं करते। अनृतए असुर ये तो सृष्टि की विकृति ष्बिगाड़श् हैं। बिगाड़ की आयु कितनी भी होए वह सनातनए शाश्वत काल तक टिक नहीं सकता। प्रकृति की करनी ही कुछ ऐसी है कि वह विकृति का संस्कार करके शोधन कर लेती है। अतः अन्ततः असुर को देख के हाथों परास्त होना ही है। अनृत को छोड़कर मनुष्य को सत्य को लेना ही है।

ऋत के विरोध अथवा ऋतहीनता का अभिप्राय है सत्य के बीज का विनाश अथवा अभाव। ऋत का परिणाम है सत्य। ऋत समष्टि में व्याप्त ऊर्जा वा शक्ति है। सत्य ऋत की ठोसए स्थूलए भोग्य व्यष्टि रूप परिणति है। ऋत को ग्रहण करके उसे ऋतुविधान अथवा कालचक्र के अनुसार सत्य में ढाल लिया जाता है।



केसे करें संध्या वंदन ण्घ्घ्घ्



इस संध्या की उपासना के प्रकरण में इसके आठ अंग महत्वपूर्ण बतलाए गए हैं। उनके नाम तथा क्रम इस प्रकार हैं . प्राणायामए मंत्र आचमनए मार्जनए अघमर्षणए सूर्यार्घए सूर्योपस्थानए गायत्रीजप और विसर्जन। प्राणायाम एक प्रकार का श्वास का व्यायाम है। इसके तीन अंग बतलाए हैं . पूरकए कुंभक और रेचक। पूरक करते समय दाहिने हाथ की दो अँगुलियों से नाक के बाँए छिद्र का बंद करके दाहिने छिद्र से धीरे.धीरे श्वास खींचना चाहिए। गायत्री मंत्र का जप करते रहना चाहिए। साथ ही अपने नाभिप्रदेश में ब्रह्मा का ध्यान करना चाहिए।

कुंभक करने के समय दाहिने हाथ की दो अँगुलियों से नाक के बाएँ छिद्र को और हाथ के अँगूठे से नाक के दाहिने छिदे का बंद करके पूरक द्वारा भरे हुए श्वास को अपने शरीर में रोकना चाहिए। साथ.साथ अपने हृदयप्रदेश में विष्णु का ध्यान करना चाहिए। रेचक करने में दाहिने हाथ के अँगूठे से नाक के दाहिने छिद को बंद करके बाएँ छिद्र से रोके हुए श्वास को धीरे.धीरे अपने शरीर में से बाहर निकालना चाहिए। इन तीनों ही क्रियाओं को करते हुए एक बारए कुंभक करते हुए चार बार और रेचक करते हुए दो बार मंत्र का आवर्तन करना चाहिए। इस प्रकार किया हुआ कृत्य प्राणायाम कहा जाता है।

प्राणायाम करने से शरीर के भीतरी अंगों की शुद्धि तथा पुष्टि होती है। बुद्धि निर्मल होकर शांति मिलती है। इसको करनेवाले सभी प्रकार के रोगों से मुक्त रहते हैं। प्राचीन काल में ऋषि लोग इसी प्राणायाम के सेवन से अनेकविध अलौकिक कार्यो को करने में समर्थ होते थे। मंत्र

आचमन . दाहिने हाथ की हथेली में जल लेकर मंत्र का पाठ करके हथेली का जल पीना मंत्र आचमन है। इस मंत्र का तात्पर्य यह है कि मैंने मनए वाणीए हाथए पैरए उदर और जननेंद्रिय के द्वारा जो कुछ पाप किया हो वह सकल पाप नष्ट हो। जल में गंदगी दूर करने की स्वाभाविक शक्ति है। इसमें सकल प्रकार की औषधियों का जीवन निहित है। अन्न के लिए यही प्राण है। इससे विद्युत् की उत्पत्ति देखी जाती है। दुर्भावनाए दुर्वासना एवं हर प्रकार के पाप को यह दूर करता है। इसी उद्देश्य से यहाँ पर मंत्र विहित हैं। मार्जन . जिस क्रिया में वैदिक मंत्रों का पाठ करते हुए शारीरिक अंगों पर जल छिड़का जाता है उसे मार्जन कहते हैं। मार्जन करने से शारीरिक अंगों की शुद्धि होती है।
अघमर्षण . इसके द्वारा मानव शरीर में विद्यमान दूषित वासनारूपी पापपुरुष को शरीर से पृथक् करना है। इसका विधान इस प्रकार है . दाहिने हाथ की हथेली में जल लेकर वैदिक मंत्रों का पाठ करते हुए जलपूर्ण दाहिने हाथ को नाक के निकट ले जाना चाहिए। इसके साथ ही यह ध्यान करना चाहिए कि नाक के दक्षिण छिद्र से निकलकर पापपुरुष ने हथेली के जल में प्रवेश किया। इसके अनंतर हाथ का जल अपनी बाईं ओर भूमि पर फेंक देना चाहिए।
इस क्रिया का लक्ष्य अपने शरीर से पापपुरुष को बाहर निकालकर मन को पवित्र करना और अपने को उपासना करने के योग्य बनाना है। इस विधान का विस्तार ष्भूत शुद्धिष् प्रकरण में देखना चाहिए। सूर्यार्ध . इस क्रिया के द्वारा अंजलि में जल लेकर गायत्री मंत्र का पाठ करते हुए खड़े होकर सूर्य को अर्ध दिया जाता है। यह अर्ध तीन बार देना आवश्यक है।

यदि संध्या की उपासना का समय बीत चुका हो और यह उपासना विलंब से की जा रही हो तो प्रायश्चित्त के रूप में एक अर्ध अधिक देना चाहिए। किसी विशिष्ट व्यक्ति के आगमन के उपलक्ष में अर्ध देने की परिपाटी प्राचीन काल से चली आती है। इसका मूल यही सूर्यार्ध है। ष्सूर्योपस्थानष् . इस क्रिया में वैदिक मंत्रों का पाठ करते हुए खड़े होकर सूर्य का उपस्थान किया जाता है। प्रातरूकाल की सूर्य की किरणें मानव शरीर में प्रविष्ट होकर मानव को स्फूर्ति तथा आरोग्य प्रदान करती हैं। इन किरणों में अनेक रोग दूर करने की शक्ति विद्यमान है। विशेषकर हृदयरोग के लिए ये अत्यंत लाभ करनेवाली सिद्ध हुई हैं। इस समय विद्यमान सूर्यकिंरणचिकित्सा का यही मूल स्रोत है। गायत्रीजप . किसी मंत्र के निरंतर अवर्तन को जप कहते हैं।
कायिकए वाचिक और मानसिक भेदों से जप तीन प्रकार का कहा गया है। इनमें मानसिक जप उत्तम कहा है। जप करते हुए मन को एकाग्र और शरीर को निश्चत्त रखना आवश्यक है। जप करते समय मंत्र के देवता का ध्यान करते रहने से देवता के साथ उपासक की तन्मयता हो जाती है। जप के अनंतर सूर्य देवता को जप का समर्पण करना चाहिए।
अंत में अपनी उपासना के निमित्त आवाहित देवता का विसर्जन करना चाहिए। इस प्रकार की हुई उपासना को सर्वव्यापी ब्रह्म को अर्पित कर देना चाहिए। इस विधान के अनुसार निरंतर उपासना करते रहने से मानव अपने शरीर में उत्पन्न होनेवाले समस्त रोगों से दूर रहता हैए समस्त सुख प्राप्त करता है और अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति करता है।

इस सत्योपासना के लिए ऋषि यज्ञ करते हैं। यज्ञ का स्थल वेदि कहाता है। वेदि देवनिर्माण की भूमि है। यहॉं मनुष्य को देव में ढाला जाता है। अतः ब्रह्मा ऋषि का याजक.वर्ग को आदेश है कि वेदी की महिमा को समझो। जीवनवेदी यों ही भोग.विलास में बरबाद करने के लिए नहीं है। भोगविलास तो इस मनुष्य योनि से पूर्व की पशु योनियों में खूब.खूब किया ही है। मनुष्य योनि सेतु है पशु से देव तक पहुंचने के लिए। अतः मनुष्य केवल पशु नहीं हैए वह उससे कुछ अधिक है। पशु को अपने जीवन से असन्तोष नहीं होता। अतः वह अपने को बदलने कीए कुछ उन्नति करने की नहीं सोचता। पशु को लज्जा और पश्चाताप नहीं होते। मनुष्य ही है जो अपने वर्तमान से असन्तुष्ट रहता है और अपने जीवन को बदलने कीए उत्थान की सोचता है। अतः देव बनना पशु की नहींए मनुष्य ही की नियति है। मनुष्य का भूतकाल और वर्तमान काल पशु.कोटि का है। पर वह चाहे तो अपने को पशुत्व से ऊपर उठाकर देव बना सकता है। यह सामर्थ्य उसे अर्थ और काम के वशीभूत होने से नहीं मिल सकती। देवारोहण के लिए उसे ष्स्वश् क्षेत्र को यज्ञ की ष्वेदिश् बनाना होगा।
मनुष्य अपने पूर्व संस्कारों से पशु है। अतः उसके चित्त में सब पशुओं के संस्कार संचित हैं। कभी उसका व्यवहार डंक मारने का होता हैए कभी डसने का। कभी वह सींग मारता सा प्रतीत होता हैए कभी दुलत्ती मारता सा। कभी वह अपनों पर भौंकता हैए कभी अपनों को चबाता है। ये सब पशु उसके साथ हैं। पर इन्हें अपनी जीवनवेदि पर चढ़ने नहीं देना है। मनुष्य को चाहिए कि इन पशुओं के साथ जीवनवेदि की पूज्य भाव से परिक्रमा करे। इससे पशु भाव का संयमन होगा और फिर शमन होगा। अभ्य्‌ आ वर्तस्व पशुभिः सहैनां से यह अभिप्राय ग्रहण करना चाहिए।
पशुशमन से मनुष्य में अब देवताओं का आगमन जीवनवेदि पर होने लगता है। देवता वे शक्तियॉं हैं जो यज्ञ के ऋषि.यजमान की कामना को अर्थ रूप फल से समृद्ध बना सकती हैं। पशु शक्तियों का परिष्कृतए सुसंस्कृत रूपान्तर ही देवता.शक्तियॉं है। कूरता पशुशक्ति हैए करुणा देवता शक्ति है। ममता पशु हैए त्याग देवता है। भोग की ललक पशु हैए संयम देवता है। अविचार पशु हैए विचारशीलता देवता है। देवताओं के साथ जीवनवेदि के सामने रहना चाहिए। सामने रहना देवयान से पथ पर रहना है। देवयान से देव स्वर्ग और वेदि के बीच आते जाते हैं। यह यज्ञ के देवों तक पहुंचने का पथ है। देव ष्स्वःश् तक गमन का पथ जानते हैं। अतः ष्स्वश् क्षेत्र को ष्स्वःश् लोक ;स्वर्‌.गद्धद्ध बनाने के लिए वेदि के सम्मुख देवताओं की संगति में रहना चाहिए। स्व को स्वः बनाने में यज्ञ की सुफलता है और वेदि की सार्थकता है। देवताओं की संगति से पशु कोटि का जीवन एक नवीन रूपान्तर पाकर ष्वेदिश् उपलब्धि स्थल बन जाता है। इस लब्धि.बिन्दु पर देव मिलते हैंए स्वयं को देवत्व मिलता हैए स्वः मिलता है। वेद से वेदि बनती है। वेद कहते हैं ज्ञान कोए सत्ता कोए लाभ को। वेदि पर आत्म ज्ञान की उपलब्धिए अपनी अजर.अमर.शाश्वत सत्ता का बोध और चिर स्थिर अनन्त आनन्द का लाभए ये सब सिद्ध हो जाते हैं। वेद क्रमशः ज्ञान.क्रिया.भावना है। यजमान के ज्ञान.क्रिया.भावनाए सब देवकोटि के हो जाते हैं। इस प्रकार वेद द्वारा यज्ञ सम्पन्न कर ऋषि देव बनकर आप्तकाम हो जाते हैं।

जिस प्रकार अच्छा सारथी ही रथ को उचित मार्ग पर ले जा सकता है द्य उसी प्रकार अच्छा ब्रह्म ज्ञानी ही ब्रह्म के जिज्ञासुओं एवं ब्रह्म संस्थानों को आगे बढ़ा सकता है द्य इस प्रकार के इस उपासक का फल है अपना निर्माण और पर निर्माण द्य उपासक का यह प्रकार ही सर्व श्रेष्ठ प्रकार है द्य और सब प्रकार इसी की और ले जाने के साधन हैं द्य
आपके ज्ञान से बचा हुआ संसार का कोई भी तो अणु नहीं द्य कारण और कार्य रूप प्रत्येक तत्व आपके विज्ञान से जगमगा रहा है द्य फलतः आपकी दी हुई गति और आपके विज्ञान का प्रत्येक अणु में प्रसार है द्य

बुधवार, 8 मई 2013




ॐ प्रणव का सबसे पहले उच्चारण इसलिये किया जाता है कि ॐ प्रणव सबसे पहले प्रकट हुआ है। ॐ ब्रह्म का वाचक भी है। इसमें तीन ध्वनियाँ.अए उ और म शामिल हैं।  अ उष्मा या विकास की अग्नी हैए उ उठना तथा म संकोच अथवा लीन हो जाना है।अ और म के मिश्रण से ही पूरी सृष्टी बनी है। इस प्रणव की तीन मात्राएँ हैं। इन मात्राओं से त्रिपदा गायत्री प्रकट हुई हैं और त्रिपदा गायत्री से ऋक्सामयजुः..वेद त्रयी प्रकट हुई हैं।

       श्री-सूक्त
 हिरण्यवर्णां  हरिणिं   सुवर्णरजतस्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१।।
  तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
 यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम्।।२।।
 अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदनीम्।
श्रियं देवीमुप हृये श्रीर्मा देवी जुषताम्।।३।।
कां सोस्मितां  हिरण्यप्राकारा माद्रां
ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां 
तामिहोप हृये श्रियम्।।४।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं
श्रीयं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये
ऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वा वृणे।।५।।
आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो 
वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुन्दतु
या अन्तरा याश्र्च बाह्या अलक्ष्मीः।।६।।
उपैतु मां देवसखः 
कीर्तिश्च मणीना सह।
प्रादर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्
कीर्तिमृद्धिं ददातु मे।।७।।
क्षुत्पिपासामलां  ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमशमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात्।।८।।
गन्धद्वारां दुराधुर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप हृये श्रियम्।।९।।
मनसः काममाकूर्तिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूमन्नस्य मयि श्रीःश्रयतां यशः।।१०।।
कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम।
श्रियं वासय मे कूले मातरं पद्ममालिनीम्।।११।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले।।१२।।
आर्द्रां पुषपकारणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१३।।
आर्द्रां यः करणीं यघ्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह।।१४।।
तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो
दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरुषानहम्।।१५।।
यः शुचिः प्रयतो  भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत्।।१६।।
 
 ५...        महा मृत्युञ्जय मन्त्र
      त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
        उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ।।
            (ऋग्वेद ७।५९।१२)(शुक्ल यजुर्वेद ३।६०)
     अर्थात.
     हम त्रिनेत्रधारी  भगवान्  शंकर की पूजा करते  हैंए मंत्यधर्म से (मरणशील मानवधर्म मृत्यु से) रहित दिव्य सुगन्धि से युक्तए उपासकों के लिये धन.धान्य आदि पुष्टि को बढ़ाने वाले हैं। वे त्रिनेत्रधारी उर्वारुक (कर्कटी या ककड़ी.जो पकने पर स्वतः पौध से अलग हो जाती है) फल की तरह हम सबको अपमृत्यु या सांसारिक मृत्यु से मुक्त करें। स्वर्गरूप या मुक्तिरूप अमृत से हमको न छुड़ायें अर्थात् अमृत-तत्व से हम उपासकों को वंचित न करे ।

  ६...वेदोक्त रात्रिसू्क्त  (ऋग्वेद १०।१२७। १से८ )

                 रात्री व्यक्यदायती पुरुत्रा देव्य१ क्षभिः। विश्र्वा अधि श्रियोऽधित।।१।।

        अनेक भागों में विस्तृत होने वाली अगमन करती हुई नक्षत्ररूप नेत्रो से जगत् का अवलोकन करने करने वाली रात्रिदेवी सभी प्रकार केसौन्दर्य को धारण करती हैं।

           ओर्वप्रा अमर्त्या निवतो देव्यु१ द्वूतः। ज्योतिषा बाधते तमः।।२।।

       अविनाशी रात्रि देवी सर्वप्रथम अन्तरिक्ष को तत्पश्र्चात् नीचे और ऊँचे प्रदेशो को आच्छादित करती हैं। वे ग्रह.नक्षत्रादि रूप से तेजस्विता से अन्धकार को निवृत करती हैं।

         निरु स्वसारमस्कृतोषसं देव्यायती। अपेदु हासते तमः।।३।।

      आगमन करने वाली रात्रिदेवी भगनी उषा को प्रतिष्ठित करती हैं। वे ;उषाद्ध अन्धकार को विनष्ट करती हैं।

        सा नो अद्य यस्या वयं नि ते यामन्नविक्ष्महि। वृक्षे न वसतिं वयः।।४।।

      जैसे पक्षी वृक्षों पर रहते हैंए वैसे ही जिसके आगमन पर हम घर में विश्राम करते हैंएवे रात्रिदेवी हमारे लिये कल्याणप्रद हों।

       नि ग्रामासो अविक्षत नि पद्वून्तो नि पक्षिणः। नि श्येनासाश्र्चिदर्थिनः।।५।।

     रात्रि में समस्त ग्रामीण मनुष्य सुखपूर्वक सोते हैंए पादचारी अश्वादि पशु.पक्षी और शीघ्रगामी शयेन आदि पक्षी शान्त होकर सोते हैं।

      यावया वृक्यं१वृकं यवय स्तेनमूर्म्ये।अथा नः सुतरा भव।।६।।

    हे निशादेवि ! वृक और वृकी को हमसे पृथक् करेएचोरों को भी हमसे दूर ले जाएँ। हमारे लिये आप सभी प्रकार से कल्याणप्रद हों।

     उप मा पेपिशत्तमः कृष्णं व्यक्तमस्थित ।उष ऋणेव यातय।।७।।

   रात्रि का अन्धकार स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। हे उषा देवी! जिस प्रकार आप स्तोताओं के ऋण को धन प्रदान करके विनष्ट करती हैंए वैसे ही इस अन्धकार को भी नष्ट करें।

     उप ते गा इवाकरं वृणीष्व दुहितर्दिवः। रात्रि स्तोमं न जिग्युषे।।८।।

   हे आकाश कन्या ;रात्रिद्ध! हम आपको दुधारू गौ के समान स्तोत्रों का गान करते हुए प्राप्त करें। आप विनम्र होकर स्तोत्रों के समान ही हवि को भी ग्रहण करें।
ऋग्वेदीय संदेश  
                        ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविराविर्य एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि।सत्यं वदिष्यामि तन्मामवतु। तद् वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

अर्थात.
     मेरी वाणी मन में और मन वाणी में प्रतिष्ठित हो। हे ईश्वर! आप मेरे समक्ष प्रकट हों। मन और वाणी! मझे वेदविषयक ज्ञान दो। मेरा ज्ञान क्षीण नहीं हो। मैं अनवरत अध्ययन में लगा रहूँ। मैं श्रेष्ठ शब्द बोलूँगा, सदा सत्य बोलूँगा, ईश्वर मेरी रक्षा करे। वक्ता की रक्षा करे। मेरे अध्यात्मिकए आधिदैविक और आधिभौतिक त्रिविध ताप शान्त हों।
शान्ति प्रार्थनाः.
      (1) पृथिवी शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिर्द्यौः शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिर्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे मे देवाः शान्तिः सर्वे मे देवाः शान्तिः शान्तिः शान्तिः शान्तिभिः ।
                               (अथर्ववेद १९।९।१४)
         अर्थात् पृथिवी हमें शान्ति देय आनतरिक्षएद्यौए जल औषधएवनस्पतिए विश्वदेव सब देवता शान्ति देय इन सब शान्तियों के अतिरिक्त मझे शान्ति प्राप्त हो। इनके द्वारा विपरीत अनुष्ठान से भयंकर प्राप्त होने वाले फल को हम दूर करते हैं। सब मङ्गलमय होएशान्तिहोएकल्याण हो।